महिला दिवस पर भी कमाने को मजबूर है मातृत्व



महिला दिवस जो की हर वर्ष आठ मार्च को मनाया जाता है। यह दिवस महिलायों को पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर चलने के लिये धन्यवाद के रूप में मनाया जाता है, साथ ही इस दिन प्रत्येक मनुष्य हर नारी के प्रति आभार प्रकट करता है, कोई साथ चलने के लिये, कोई ख्याल रखने के लिये तो कोई दुनिया में लेन के लिये। लेकिन क्या यह आभार केवल ऊँचें ओहदों पर बैठी बेटियों, महिलायों या माताओं के प्रति ही प्रकट किया जाना चाहिये? और वो मातायें, बहनें जो गरीबी से लड़ने की कोशिश में लगी रहती है, जिन्हें दीनदुनिया से कोई मतलब नहीं है। यह जानती हैं तो बस दो जून की रोटी कमाना और सामने आती परेशानियों से लड़ना, जूझना और जूझते - जूझते जीना। क्या वो महिलाएं नहीं है ??
प्रशासन को भी बस वही महिलाएं नज़र आती है जो ऊँचे ओहदों पर बैठी है और जिनका नाम जानी मानी हस्तियों में शुमार है शायद इसीलिए महिला दिवस के मौके पर रायपुर में महिला महोत्सव के नाम पर जलसे का का आयोजन किया गया उन महिलायों का क्या जिन्हें न तो महिला दिवस का मतलब मालूम है और न ही वे जानना चाहती है उन्हें तो मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत से जिसके भरोसे वें खुद भी जीती है और हम जैसों को जीने की कला भी सिखाती है असली मात्र शक्ति वही है जिनको नमन करने के लिये न तो किसी जलसे की आवश्यकता है और न ही किसी महोत्सव की। बिना किसी लाग लपेट के अंतर मन के भावों से हम करते है उन्हीं महाशक्तियों को नमन।

1 Response to "महिला दिवस पर भी कमाने को मजबूर है मातृत्व"

  1. ललित शर्मा says:
    March 9, 2010 at 5:25 PM

    सृजन शिल्पियों को हमेशा कर्मरत रहना पड़ता है.
    तभी धरा-गगन-अन्तरिक्ष स्थित है.
    बहुत सुन्दर विचार हैं आपके

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