कहाँ है भारत देश के वासी.....

सच और झूठ की इस कशमकश में इंसान क्यों दूसरे इंसान का दुश्मन बनता चला जा रहा है। क्यों आज एक इंसान किसी दूसरे इंसान का भला होता नहीं देख पा रहा है। ऐसे में इंसानियत के चोगे में खुद को लपेट कर, क्या खुद को इंसान मान लेने से कपड़ो के अन्दर का हमारा नंगापन ढक जायेगा..?
नहीं...; क्योंकि हम हर इंसान को धोखा दे सकते है, लेकिन खुद को झांसा नहीं दे सकते।
क्या सभी खुद का लिज़लिज़े शरीर को कपड़े मात्र से ढककर अपने अस्तित्त्व को ही खत्म कर लेते है। आईने के सामने कभी गौर से देखा अपने आपको...........? या अब सिर्फ बाल कोरने और खुद को एक नज़र भर देखने के लिए आईने का इस्तेमाल कर रहा है आज का भारतीय???
संस्कारो की आड़ में स्वयं को अभद्रता की आग में झोंक देने के बाद भी हम कैसे कह सकते है, कि हम भारत देश के निवासी है। जहाँ के वासियों को सिर्फ उनकी मानवता के लिये ही जाना जाता है। यह वही भारत देश है जिसके रिति - रिवाजों, संस्कारो और संस्कृतियों का डंका सारी दुनिया में बजता रहा है। कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भले ही यहाँ का निवासी निरक्षरता के अंधेरों में रहा हो, लेकिन बेरोज़गारी के थपेड़ो से हमेशा बचा रहा है यहाँ पत्थरो को भी भगवान का दर्जा दिया जाता है, तो वहीँ अतिथियों को देवों सा मान मिलता है। लेकिन अब यह सब कहीं ना कहीं किताब में कहानियों की तरह दब के रह गया है। या फिर यूँ कहें कि पश्चिमी सभ्यता ने इसे अपने कदमों तले रौंद कर रख दिया है। आज का भारती केवल खुद को दूसरों से बेहतर बताना और दिखाना चाहता है। वह केवल पश्चिमी सभ्यता के वशीभूत होने की पुरजोर कोशिश में लगा है। लेकिन आज भी उसे पश्चिमी देशो की प्रगति का मूल मंत्र मालूम नहीं है। सिर्फ पाश्चात्य कपड़े पहन कर कोई विदेशी नहीं हो जाता आवश्यकता है मानसिकता को बदलने और मनोबल को बढ़ाने की, या फिर टटोलने और तलाशने के बाद खूबियों की तरह अपने अन्दर उतारने की..... आने वाली पीढ़ी को कैसे भारत से रूबरू करवाना है अब यह तो बस हम भारतीयों के ही हाथो में है। मैंने इस ब्लॉग में लिख कर आप को आप ही के सामने रख कर अपने फ़र्ज़ को पूरा किया है। आप इसे किस नज़रिए से देखते है यह तो आप पर ही है।

1 Response to "कहाँ है भारत देश के वासी....."

  1. दिगम्बर नासवा says:
    February 14, 2010 at 10:13 PM

    विचारणीय बात लिखी है आपने ..... हम मानसिक रूप से गुलाम हो रहे हैं ... अपनी सभ्यता को छोड़ कर पाश्चात्य सभ्यता की तरफ बढ़ रहे हैं और उसे भी पूरी तरह से नही अपना रहे ... ढोंग कर रहे हैं .... प्रभावी लिखा है आपने ...

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