मेट्रोज़ बनाम छोटे शहर....

एक कठिन सफर का नाम जीवन है। इस सफ़र में कई आड़े टेढ़े रास्ते आते हैं। कई बार उलझन भी होती है कि अब कौन सा रास्ता चुनें ? कभी आसानी से कट जाने वाले ढलान भरे रास्ते मिलते हैं तो कभी ऊंची चढ़ाई भी हमें तय करनी पड़ती है, हम मुसाफिर की तरह चुपचाप चल रहे होते हैं, साथी कोई मिला तो ठीक न मिला तो ठीक। अब मंजिल किस- किस को मिलेगी यह कह पाना बहुत मुश्किल है। भारत की राजधानी दिल्ली की कभी न थकने वाली दुनिया में अपनी उम्र का एक लम्बा अरसा बिताने के बाद मैं रायपुर आ गयी। यहाँ आने के बाद हर चीज़ के प्रति मेरा नजरिया बदलता गया , मानो अस्तित्व कहीं अपने आप में सिमट कर रह गया । रायपुर मुझे शुरू से ही एक छोटे कस्बे से ज्यादा कुछ नहीं लगा। मेट्रोज़ में किसी को किसी से कोई मतलब नहीं होता, सबको बस अपने काम और अपने आप से मतलब होता है। लेकिन रायपुर में आपके अपने सिवा सबको केवल आप ही से मतलब है। आपने क्या खाया, क्या पहना हुआ है, क्यों पहना है, कहा जा रहे हो, क्यूँ जा रहे हो.... वगैरह वगैरह। लाइफ का स्पेस कही खो गया है। तेज़ रफ़्तार भरी लाइफ स्टाइल के बाद यहाँ ज़िन्दगी वापस बैलगाड़ी की तरह हो गई है। चली तो चली वरना बैठो राम -भरोसे। लेकिन जहाँ इतनी खामियां है वहां कुछ अच्छाईयाँ भी तो है। लोगों से मिलने वाला अपनापन, प्यार, घरो के संस्कार, काफी कुछ जानने को मिला। कुछ पाने की चाहत में किसी के लिये कुछ करना, व्यवहार होता है, लेकिन बिना किसी चाहत के, किसी के लिये कुछ करना अपनापन और इंसानियत होता है। बस एक यही केद्र बिंदु मेरे सफर का मूल आधार है। यही मैंने अब तक की ज़िन्दगी में जाना और माना , लेकिन रायपुर में मैंने सीखा कि लोगों का इस्तेमाल कैसे किया जाता है और अपना मतलब निकल जाने के बाद दूसरे को दूध में से मक्खी की तरह कैसे निकाल कर फेंका जाता है। वैसे ये दुनिया की रीत है, पर मैंने एकदम करीब से देखा ये सब- ज़बान होते हुए भी गूंगी बनी रही, इतना सब कुछ देख लेने के बाद अब लगता है कि अपने पिता कि जन्मभूमि पर आने का मेरा फैसला कहीं गलत तो नहीं था। पापा कहते है बेटा जैसे झुण्ड से भटका पक्षी एक दिन अपने झुण्ड में वापस चला जाता है। ठीक उसी तरह छोटे- छोटे गावों और कस्बो से मेट्रोज़ में अपनी ज़िन्दगी बनाने आये लोग भी एक न एक दिन अपनी कर्मभूमि को छोड़कर अपनी जन्मभूमि में वापस ज़रूर लौटते है। लेकिन अब लगता है कि पापा यहाँ न ही आयें तो अच्छा है।

किसी को अगर उसके किये की सज़ा देनी हो तो उसे माफ़ कर दो, यही उसकी सबसे बड़ी सज़ा है, क्योंकि हमेशा गलती सहने वाले से ज्यादा गलती करने वाला अपने किये की सज़ा भुगतता हैसमय ख़राब है शायद तभी इतना कुछ देखने को मिला। जब वक़्त सही होगा तब सब कुछ अपने आप सही होता चला जायेगा यहीं मानकर बीती बातो को भुलाने के बाद आगे के बारे में सोचो और हमेशा आगे की और अग्रसर रहोयह मूल मन्त्र मुझे मेरे गुरु से प्राप्त हुआ है उनको देखकर ही इतना कुछ सीखा है मैंने। उनका एक स्लोगन मुझे अच्छा लगता है कि
''हर मील के पत्थर पे ये इबारत लिख दो, कमज़ोर इरादों से कभी मंजिल नहीं मिलती'' ।

1 Response to "मेट्रोज़ बनाम छोटे शहर...."

  1. संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari says:
    April 15, 2010 at 8:53 AM

    रायपुर जैसे सभी छोटे शहर महानगर बनने की होड में अपनी स्‍वाभाविक अपनापन खो रहे हैं. रायपुर में अभी अपनापन शेष है उसका आनंद लो. आपके पापा वापस अपने गृहनगर आना चाहते हैं यह खुशी की बात है क्‍योंकि चकाचौंध के बाद भी जड़ों से जुड़ने में एक आध्‍यात्मिक सुख है.

    आपका मूल मंत्र हमें भी पसंद आया. सार्थक लेखन के लिए धन्‍यवाद.

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