समय ही बलवान है ....

जब वक़्त ख़राब होता है तब कुछ भी ठीक नहीं रहता, ना इंसान ना काम। समय अपनी गति से ही चलता है और हमें लगता है कि आखिर यह बुरा वक़्त कब जायेगा। बीतते हुए हर पल से इससे हमें सीख लेनी चाहिए कि शायद इससे भी कुछ बुरा हो सकता था, पर हुआ नहीं....जीवन के मूल्य को समझो और यकीन करो कि तुम भी दुनिया के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हो। ऐसा मान लेने से कभी भी कहीं भी कमज़ोर नहीं पड़ोगे। वो कहते है न कि... जीवन को केवल जीना ही नहीं, जीने का एक अंदाज़ भी ज़रूरी है। बुरे वक़्त में अक्सर इंसान सबसे ज्यादा तब अकेला हो जाता है, जब वो खुद ही अपना साथ छोड़ देता है। लेकिन हार कर कोई जीत पाया है भला???
मेरा तो ऐसा मानना है की हर किसी का बुरा वक़्त आना चाहिए इससे पता तो चल जाता है कि कौन आपका अपना है और कौन पराया... लेकिन दूसरों के साथ उनके जैसा ही व्यवहार करने से उनमें और हम में क्या फरक रह जायेगा। हमें हमेशा दूसरों कि अच्छाइयों और अपनी बुराईयों को देखना चाहिए तभी अपने और दूसरे के बीच का अंतर समझ में आता है।

गुज़रता वक़्त बहुत ख़राब है, अपने आपको सम्भाल कर चलो। क्यों किसी से कोई झगड़ा मोल लेना।
मानो तो सभी अपने है। ना मानो तो लाखो कि भीड़ में तुम ही एक अकेले हो।




चढ़ता - उतरता प्यार का बुखार...(इमोशनल अत्याचार)

बिल्ली जब ढूध पीती है तो सोचती है कि उसे कोई नहीं देख रहा, लेकिन बिल्ली के खुद आँख बंद कर लेने से सच्चाई नहीं बदल जाती। हक़ीकत कुछ और ही होती है । ठीक उसी तरह जब हम आपस में एक दूसरे को धोखा देते हैं तो समझते हैं कि अगले को कुछ पता नहीं चलेगा। लेकिन सच कभी छुपाये छुपा है भला....? देर सवेर ही सही, सच किसी न किसी तरह लोगों के सामने आ ही जाता है। अब बुद्धू बक्से की बात करें और उसके रिअलिटी शोज़ की बात करें तो कुछ बिल्ली और उसकी सोच का अलग ही बोध होता है ।
बुद्धू बक्से ने लोगों को घर घुसरा बनाने के बाद एक नया तरीका निकाला है, लोगों को अपने चंगुल में फंसाने का। यू टीवी बिंदास पर आने वाले प्रोग्राम "इमोशनल अत्याचार" के पहले से लेकर अब तक के लगभग सभी एपिसोड मैंने देखे हैं । इसमें लोगों के प्यार में लायल होने का पता लगाया जाता है। प्यार में सही और गलत होने का यह अच्छा तरीका निकाला है इस चैनल वालो ने, जिसमें अब तक केवल एक केस में पोजिटिव रेस्पोंस आया, बाकी में नेगेटिव। इसका मतलब केवल यही पता लगा सकते हैं कि कौन इंसान कितना सही है और कितना गलत.....| वो भी अपने एक अलग ही तरीके से जिसमें यह परोसते हैं तो केवल अश्लीलता। इससे कुछ हो या ना हो, लेकिन लोगों के सिर पर प्यार का बुखार चढ़ता है, तो कभी उतरता है और उतर कर फिर चढ़ जाता है...| इस शो के चलते लोगों का ज़िन्दगी के प्रति एक और नजरिया बन गया है कि.... आये तो बेस्ट नहीं तो नेक्स्ट। घर घुसरा बनाने के बाद अब अपने देखाए रास्तों पर चलाने की साजिश कर रहा है ये बुद्धू बक्सा।

महिला दिवस पर भी कमाने को मजबूर है मातृत्व



महिला दिवस जो की हर वर्ष आठ मार्च को मनाया जाता है। यह दिवस महिलायों को पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर चलने के लिये धन्यवाद के रूप में मनाया जाता है, साथ ही इस दिन प्रत्येक मनुष्य हर नारी के प्रति आभार प्रकट करता है, कोई साथ चलने के लिये, कोई ख्याल रखने के लिये तो कोई दुनिया में लेन के लिये। लेकिन क्या यह आभार केवल ऊँचें ओहदों पर बैठी बेटियों, महिलायों या माताओं के प्रति ही प्रकट किया जाना चाहिये? और वो मातायें, बहनें जो गरीबी से लड़ने की कोशिश में लगी रहती है, जिन्हें दीनदुनिया से कोई मतलब नहीं है। यह जानती हैं तो बस दो जून की रोटी कमाना और सामने आती परेशानियों से लड़ना, जूझना और जूझते - जूझते जीना। क्या वो महिलाएं नहीं है ??
प्रशासन को भी बस वही महिलाएं नज़र आती है जो ऊँचे ओहदों पर बैठी है और जिनका नाम जानी मानी हस्तियों में शुमार है शायद इसीलिए महिला दिवस के मौके पर रायपुर में महिला महोत्सव के नाम पर जलसे का का आयोजन किया गया उन महिलायों का क्या जिन्हें न तो महिला दिवस का मतलब मालूम है और न ही वे जानना चाहती है उन्हें तो मतलब है सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत से जिसके भरोसे वें खुद भी जीती है और हम जैसों को जीने की कला भी सिखाती है असली मात्र शक्ति वही है जिनको नमन करने के लिये न तो किसी जलसे की आवश्यकता है और न ही किसी महोत्सव की। बिना किसी लाग लपेट के अंतर मन के भावों से हम करते है उन्हीं महाशक्तियों को नमन।

ज्यादा पैसे का नतीजा; कौन चाचा और काहे का भतीजा..
















क्या ज़माना है? दुनिया में पैसा क्या आया, रिश्तों का नामो निशान मिट गया। क्या रिश्ते क्या नाते...? लोगों को दिखता है तो पैसा, पैसा और बस पैसा.....; बंद मुट्ठी लिये आया था, हाथ पसारे जाना है। पैसा यहीं रह जायेगा, इन रिश्तों को ही ले जाना है। आज के दौर में जीवन में क्या - क्या नहीं देखने को मिल रहा है। वैसे तो मेरी उम्र ज्यादा नहीं है, लेकिन फिर भी अभी तक जो भी देखा समझा है, वो बाकी की ज़िन्दगी को निभाने के लिये काफी है। पैसा है तो, दुनिया आपको पूछेगी और जानेगी, आपके रिश्तों से आपको कोई नहीं जानता, और ना ही जानना चाहता है। अमीर के कुत्ते की भूख सबको दिखती है, लेकिन गरीब का दर्द न किसी को दिखता और न ही कोई उसकी तकलीफ किसी को महसूस होती है। हाय पैसा! हाय पैसा! करती और रंग बदलती इस दुनिया में, अब पैसा कमाऊं... या अपने रिश्तों के प्रति अपना फ़र्ज़ निभाऊं। पैसा कमाने जाती हूँ तो, रिश्ते नहीं निभा सकती और रिश्ते निभाने जाती हूँ तो, पैसा नहीं कमा सकती। अब क्या करूँ? मैं तो सोचती ही रह गई... और लोग रिश्तों को भूल कर पैसे कमाने के लिये आगे बढ़ गये।
और किसी को नहीं तो आज कल इमाजिन टी वी पर आने वाले राहुल दुलहनिया ले जायेगा... रियलिटी शो के मुख्य पात्र राहुल महाजन को ही ले लीजिये। चाचा की चिता अभी ठंडी भी नहीं हुई और ये जनाब चले हैं, दुल्हनिया लेने। फिर चाहे उस शादी में राहुल की दादी शरीक हो या न हो, इससे इन्हें कोई फरक नहीं पड़ता । ऐसा करें भी क्यों नहीं... क्यूंकि, जीतने वाली दुल्हन को इनाम के तौर पर मिलने वाली नकद राशि और हीरे की अंगूठियाँ दहेज़ के रूप में आखिर में अब इन्हें ही तो मिलेंगी ना। शादी का क्या है......जैसे पहले की शादी टूटने का कारण पायल रस्तोगी बनी थी। क्या पता के इस शादी के ना बचाने का कारण शायद कहीं मोनिका बेदी बन न जाएँ ।

खैर मुझे इन सब बातो से क्या लेना... मुझे तो अपने बारे में सोचना है , क्या करे ज़माना सिर्फ अपने बारे में सोचने का ही है। पैसे का क्या है? वो तो.. मैं कभी भी कमा सकती हूँ। लेकिन अगर जो एक बार अपने रिश्ते- नाते खो बैठी तो फिर कभी नहीं कमा पाऊँगी। क्यूंकि मुझे पता है कि ...
चाहे... मैं लाख कमा लूँ हीरे मोती॥
पर रखूंगी कहाँ....?? कफ़न में तो जेब ही नहीं होती।।

भरोसा या विश्वासघात, भावनाओं का भददा मजाक...


रो कर पूछने और हँसकर उड़ा देने वाले लोगों की इस दुनिया में किसी पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। कहने को तो यहाँ कई रिश्ते है जैसे- माँ, बाप, भाई और बहन। इनके अलावा भी हम कई रिश्तों में बंधे है लेकिन इतने रिश्तों की भीड़ होने के बावजूद हम दुनिया में बिलकुल अकेले है। इस बात का इल्म हम सभी को एक -न- एक दिन ज़रूर होता है। कोई आपका नहीं होता आपका साथ केवल आपको ही निभाना पड़ता है। ज़िन्दगी; वक़्त की कसौटी पर बिछी शतरंज की उस बिसाद की तरह है, जिसमें खुद ज़िन्दगी ही हमें मिले रिश्तों को रिश्तों को गोटियों की मिसाल देकर हमें समाज के नियमों से झूझने के लिये छोड़ देती है। अब तो यह हाल है कि किसी को दिल कि बात बताने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। वो कहते है ना... कि दूध का जला हुआ छाज को भी फूंक फूंक कर पीता है। बावजूद इसके कि कुछ रिश्ते वास्तविकता से कोसो दूर होते है। और जिन्हें जिन्दादिली से जिया जाता है कभी कभी सोचने को मजबूर होना पड़ता है, कि ज़िन्दगी को हम चलाते है या ज़िन्दगी हमें चलाती है अक्सर परिस्थितयां ऐसी भी हो जाती है की मर्ज़ी हो या ना हो, ज़िन्दगी के हाथों की कठपुतली सभी को बनाना पढ़ जाता है। लेकिन क्या किसी की भावनायो का कोई मोल नहीं है। भगवान ने हमें जितनी सांसे दी है उससे कहीं ज्यादा भावनाएं दी है। जितना समझाने की कोशिश करती हूँ, उतना ही उलझती चली जाती हूँ। जिंदा लाश की तरह जीवन जीने से अच्छा है कि कठपुतली बन निशब्द खड़ी सब देखती रहूँ।

जीवन एक सफ़र या केवल संघर्ष...

जब मुफलिसी घर में आती है, तो लोगों के आपस का प्यार सबसे पहले खिड़की से कूद कर बाहर चला जाता है यह तो मालूम था। लेकिन बुरा वक़्त जाते - जाते अपने साथ रिश्तों की गहरी से गहरी मिठास को भी ले जाता है। यह अब जाके जाना है। कभी - कभी मन में यह ख्याल आता है, कि जाने खुदा ने भी क्या सोच कर सबकी तकदीर लिखी होगी, जो कि लोगो ऐसे दिन दिखा देती है, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। कहते हैं, कि किसी भी रेस में हार कभी उसकी नहीं होती जो कि पीछे छूट जाता है बल्कि उसकी होती है...जो गिरकर वापस नहीं उठ पाता। ठीक उसी तरह इंसान भी केवल वही है जो गिर के वापस खड़ा हो और संघर्ष करे। लेकिन जो बार- बार गिर जाये वो भला कितनी बार उठेगा। ज़िन्दगी को मैंने अपने नजरिये से देखा तो लगा कि दूसरों के लिए जीना ही असली जीवन है। पर अब ऐसा लगता है कि आखिर कोई कब तक दूसरों के लिए जीता रहेगा...? क्या अपनी ख़ुशी के लिये जीना ज़िन्दगी नहीं है। कभी सुना था कि ज़िन्दगी; मौत के सफ़र में दुखों की कड़ी धूप से बचाने वाला वो छायादार पेड़ है, जो सुखो की इतनी शीतल और ताज़ी छाया देता है कि दुखों की धूप और गरम हवाओं का एहसास तक नहीं होता। फिर यह जो सब कुछ हो रहा है वो सब क्या है........? अब जब ईश्वर से आमना सामना होगा तब बस एक यही सवाल होगा मेरे पास।

जलन नहीं बराबरी करो..

क्या कभी ये जानने की कोशिश की है............कि
बंद मुठ्ठी और खुले हाथ में क्या फर्क है ?
ईश्वर के सृष्टि बनाने और मानव को जीवन देने के पीछे क्या तर्क है........... ??

ईश्वर ने हमें ज़िन्दगी; जैसा अनमोल तोहफा देने के बाद भी हम सभी को कोई न कोई एक खास खूबी देकर हमें एक दूसरे से अलग बनाकर अपनी रहमत से भी नवाज़ा है। इस सच्चाई से वाकिफ़ होते हुए भी हम उसकी इनायत की कद्र नहीं करते। आगे बढ़ने की बजाये दूसरो को पीछे धकेलने और उनसे जलने में लगे रहते है। भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में इतना वक़्त ही कहाँ है, कि हम दूसरों के बारे में ज़रा भी सोच सके। लेकिन यह सब सोचने कि बजाए हम दूसरों से जलने का काम करते है। फिर न जाने कब यह जलन अन्दर ही अन्दर कुढ़न बन जाती है और हमें पता ही नहीं चलता। ऐसे हाल में आगे बढ़ने की बात के बारे में सोच पाना भी मुश्किल हो जाता है। शायद हम जलन के मारे यह भूल जाते है कि कौआ चाहे जितना भी काक ले, कभी कोयल नहीं बन सकता।

"इंसान" सृष्टि कि सबसे बड़ी संरचना है, जिसमें सिक्के के दो पहलुओं कि तरह खूबियों के साथ साथ खामिया भी है। आज उसे यह पता नहीं शायद, कि दुनिया को जैसी नज़र का चश्मा पहन कर देखोगे; दुनिया वैसी ही नज़र आएगी। यह समाज चाहे जैसा भी हो है तो हमारा ही और इसे अच्छा या बुरा बनाना भी तो सिर्फ और सिर्फ भी हमारे ही हाथों में है।